युवा संवाद मध्य प्रदेश का ब्लॉग

राम पुनियानी
धार्मिक राष्ट्रवाद के नशे में गाफिल रहने वालों को आमजनों की क्षेत्रीय व नस्लीय आकांक्षाएं दिखलाई नहीं देतीं। विभिन्न रंगों के अति राष्ट्रवादी भी इसी दृष्दिोष से पीड़ित रहते हैं।

भारतीय संघ के गठन के साथ ही, हिमाचल प्रदेश, उत्तर-पूर्वी राज्यों और जम्मू-कश्मीर के संघ में विलय का प्रश्न चुनौती बनकर उभरा। इन सभी चुनौतियों का अलग-अलग ढंग से मुकाबला किया गया परंतु आज भी ये किसी न किसी रूप में राष्ट्रीय चिंता का कारण बनी हुई हैं। जम्मू-कश्मीर इस संदर्भ में सबसे अधिक चर्चा में है। कश्मीर, सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण भौगोलिक क्षेत्र है और इसलिए वैश्विक शक्तियों ने भी कश्मीर समस्या को उलझाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों में प्रगाढ़ता की राह में कश्मीर सबसे बड़ा रोड़ा है। भारतीय साम्प्रदायिक ताकतें भी कश्मीर मुद्दे को हवा देती रहती हैं।

इस पृष्ठभूमि के चलते, जब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने धारा 370 पर राष्ट्रीय बहस का आव्हान किया तब देश में मानो भूचाल सा आ गया। उनका यह कहना कि इससे किसे लाभ हुआ, दरअसल, दूसरे शब्दों में इस धारा को हटाने की मांग थी। मोदी की बात को आगे बढ़ाते हुए भाजपा नेता सुषमा स्वराज व अरूण जेटली ने जोर देकर कहा कि धारा 370 की समाप्ति, हिन्दुत्व-आरएसएस एजेन्डा का अविभाज्य हिस्सा बनी हुई है। जेटली ने भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुकर्जी की इस मांग को दोहराया कि कश्मीर का भारत में तुरंत व पूर्ण विलय होना चाहिए। जेटली ने ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़ते-मरोड़ते हुए यह कहा कि ‘‘स्वराज, 1953 के पूर्व की स्थिति की बहाली और यहां तक कि आजादी की मांग के मूल में नेहरू द्वारा कश्मीर को विशेष दर्जा दिए जाने का निर्णय है।‘‘ इस विषय पर टेलीविजन चैनलों पर लंबी-लंबी बहसें हुईं, जिनसे केवल चर्चा में भाग लेने वालों की धारा 370 और कश्मीर के विशेष दर्जे के बारे में घोर अज्ञानता जाहिर हुई।

यह सही है कि कश्मीर में इस समय कई ऐसी ताकतें हैं जो स्वतंत्रता से लेकर स्वायत्ता तक की मांग कर रही हैं। परंतु मोटे तौर पर, राज्य में धारा 370 के प्रश्न पर एकमत है। यद्यपि यह कहना मुश्किल है कि किस मांग का समर्थन कितने लोग कर रहे हैं तथापि कश्मीर की अधिकांश जनता, धारा 370 के साथ-साथ और अधिक स्वायत्ता की पक्षधर है।

इस मुद्दे का इतिहास जटिल है। जैसा कि सर्वज्ञात है, कश्मीर सीधे अंग्रेजों के अधीन नहीं था। वह एक रियासत थी जिसके शासक डोगरा राजवंश के हरिसिंह थे। उन्होंने केबिनेट मिशन योजना के अंतर्गत गठित संविधान सभा का सदस्य बनने से इंकार कर दिया था। जम्मू- कश्मीर की आबादी का 80 फीसदी मुसलमान थे। भारत के स्वतंत्र होने के बाद, कश्मीर के महाराजा के सामने दो विकल्प थे-पहला, कि वे अपने राज्य को एक स्वतंत्र देश घोषित कर दें और दूसरा कि वे भारत या पाकिस्तान में अपने राज्य का विलय कर दें। महाराजा की इच्छा स्वतंत्र रहने की थी। जम्मू के हिन्दू नेताओं ने हरिसिंह की इस अलगाववादी योजना का समर्थन किया। जम्मू-कश्मीर राज्य हिन्दू सभाके नेताओं, जिनमें से अधिकांश बाद में भारतीय जनसंघ के सदस्य बन गए, ने जोरदार ढंग से यह आवाज उठाई कि जम्मू- कश्मीर, जो कि हिन्दू राज्य होने का दावा करता है, को धर्मनिरपेक्ष भारत में विलीन नहीं होना चाहिए‘ (कश्मीर, बलराज पुरी, ओरिएन्ट लांगमेन, 1993, पृष्ठ 5)। परंतु कश्मीर पर पाकिस्तानी सेना की मदद से कबाईलियों के हमले ने पूरे परिद्रश्य को बदल दिया।

हरिसिंह अपने बलबूते पर कश्मीर की रक्षा करने में असमर्थ थे और इसलिए उन्होंने भारत सरकार से मदद मांगी। भारत सरकार ने कहा कि वह पाकिस्तानी हमले से निपटने के लिए अपनी सेना तभी भेजेगी जब कश्मीर का भारत में विलीनीकरण हो जाएगा। इसके बाद कश्मीर और भारत के बीच परिग्रहण की संधि पर हस्ताक्षर हुए, जिसमें धारा 370 का प्रावधान था। यह विलय नहीं था। संधि की शर्तों के अनुसार, भारत के जिम्मे रक्षा, मुद्रा, विदेशी मामले और संचार था जबकि अन्य सभी विषयों में निर्णय लेने का पूरा अधिकार कश्मीर की सरकार को था। कश्मीर का अपना संविधान, झंडा, सदर-ए-रियासत व प्रधानमंत्री होना था। राष्ट्र के नाम अपने संदेश में इस संधि का  औचित्य सिद्ध करते हुए पंडित नेहरू ने 2 नवम्बर 1947 को कहा ‘‘…कश्मीर सरकार और नेशनल कांफ्रेस, दोनों ने हमसे जोर देकर इस संधि को स्वीकार करने और हवा के रास्ते कश्मीर में सेना भेजने का अनुरोध किया। उन्होंने यह कहा कि विलय के प्रश्न पर, कश्मीर के लोग, वहां शांति स्थापित होने के बाद विचार करेंगे…‘‘ (नेहरू, कलेक्टिड वर्क्स, खण्ड 16 पृष्ठ 421)। इसके बाद भारत ने संयुक्त राष्ट्रसंघ से अनुरोध किया कि वह हमले में कब्जा की गई भूमि भारत को वापिस दिलवाए और अपनी देखरेख में कश्मीर में जनमत संग्रह करवाए। इसके बाद विभिन्न कारणों से जनमत संग्रह करवाने का कार्य टलता रहा।

इसके समानांतर, भारत में एक नई प्रक्रिया शुरू हो गई। जनसंघ के मुखिया श्यामाप्रसाद मुकर्जी ने जनसंघ और पर्दे के पीछे से कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं के समर्थन से यह मांग उठानी शुरू कर दी कि कश्मीर का भारत में पूर्ण विलय होना चाहिए। उस दौर में नेहरू बाहर से जनसंघ और कांग्रेस के अंदर से अपने कई वरिष्ठ मंत्रियों के भारी दबाव में थे जो यह चाहते थे कि कश्मीर को पूरी तरह से भारत में मिला लिया जाए। नेहरू ने कहा ‘‘हमें दूरदृष्टि रखनी होगी। हमें सच्चाई को उदारतापूर्वक स्वीकार करना होगा। तभी हम कश्मीर का भारत में असली विलय करवा सकेंगे। असली एकता दिलों की होती है। किसी कानून से, जो आप लोगों पर थोप दें, कभी एकता नहीं आ सकती और न सच्चा विलय ही हो सकता है।‘‘

तबसे झेलम में बहुत पानी बह चुका है। साम्प्रदायिक ताकतों के बढ़ते शोर, गांधीजी की हत्या और भारत में साम्प्रदायिक राजनीति के उभार ने शेख अब्दुल्ला को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि कहीं उन्होंने कश्मीर को भारत का हिस्सा बनाकर गलती तो नहीं कर दी। वे धर्मनिरपेक्षता के हामी थे परंतु उन्हें यह स्पष्ट दिखाई दे रहा था कि देश के अन्य हिस्सों में फिरकापरस्त ताकतें आंखे दिखा रही हैं। उन्होंने अपने मन की पीड़ा और संषय को सार्वजनिक रूप से व्यक्त कर दिया जिसके नतीजे में उन्हें 17 साल जेल में काटने पड़े। और इसके साथ ही शुरू हुआ कश्मीर की जनता का भारत से अलगाव। पाकिस्तान ने आग में घी डालते हुए असंतुष्ट युवकों को हथियार उपलब्ध करवाने शुरू कर दिए। सन् 1980 के दशक में अल्कायदा के लड़ाकों की कश्मीर में घुसपैठ से हालात और बिगड़े। ये लोग अफगानिस्तान से सोवियत सेनाओं को खदड़ने का अमेरिका द्वारा प्रायोजित अपना मिशन पूरा कर चुके थे और उनके पास करने को कुछ नहीं था। लिहाजा, उन्होंने कश्मीर में घुसकर जेहाद की अपनी मनमानी परिभाषा के अनुरूप काम करना शुरू कर दिया। कश्मीरियत पर आधारित आंदोलन का साम्प्रदायिकीकरण हो गया। कश्मीर की जनता का संघर्ष जेहाद का तोड़ा-मरोड़ा गया संस्करण बन गया। कश्मीरियत की बात हवा हो गई। इसके नतीजे में कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाया जाने लगा और साम्प्रदायिक ताकतों को यह कहने का अवसर मिल गया कि मुसलमान अलगाववादी, देशद्रोही, हिंसक और साम्प्रदायिक हैं।

इस सदी की शुरूआतके साथ ही कश्मीर में हालात बेहतर होने षुरू हुए। परंतु लोगों का गुस्सा अब भी शांत नहीं हुआ था। यह गुस्सा पत्थरबाजी करने वाले दलों के रूप में उभरा। भारत सरकार ने इस असंतोष को दूर करने के लिए वार्ताकारों का एक दल नियुक्त किया। दिलीप पडगांवकर, राधा कुमार और एम. एम. अंसारी के इस समूह ने अपनी रपट (मई 2012) में 1953 के पूर्व की स्थिति की बहाली की मांग को खारिज करते हुए यह सिफारिश की कि कश्मीर को वह स्वायत्ता दी जानी चाहिए, जो उसे पहले प्राप्त थी। दल ने यह सुझाव भी दिया कि संसद कश्मीर के संबंध में कोई कानून तब तक न बनाए जब तक कि उसका संबंध राज्य की आंतरिक या बाह्य सुरक्षा से न हो। टीम ने धारा 370  को अस्थायीके स्थान पर विशेषप्रावधान का दर्जा देने की सिफारिश भी की। दल की यह सिफारिश भी बिलकुल उचित थी कि शनै:-शनै: राज्य के प्रशासनिक तंत्र में इस तरह परिवर्तन लाया जाए कि उसमें स्थानीय लोगों का प्रतिनिधित्व बढ़े। उसने वित्तीय शक्तियों से लैस क्षेत्रीय परिषदों की स्थापना की बात भी कही और यह भी कहा कि हुरियत और पाकिस्तान के साथ वार्ताएं फिर से शुरू की जाएं ताकि वास्तविक नियंत्रण रेखा के दोनों ओर तनाव घट सके। भाजपा ने इस रपट को इस आधार पर खारिज कर दिया कि इससे कश्मीर में भारत विलय कमजोर होगा। अलगाववादियों ने कहा कि रपट में की गई सिफारिशें अपर्याप्त हैं और इनसे समस्या का राजनैतिक हल नहीं निकलेगा।

धारा 370 पर बेशक बहस हो। परंतु हम सबको यह समझना होगा कि कश्मीरी आखिर चाहते क्या हैं? अतिराष्ट्रवादियों की उन्मादी बातें केवल घावों के भरने की प्रक्रिया को धीमा करेंगी और राज्य में प्रजातंत्र की जड़ों को कमजोर। जैसा कि नेहरू ने कहा था, सबसे जरूरी है लोगों का दिल जीतना। कानून उसके बाद बनाए जा सकते हैं। लोगों की आकांक्षाओं को समझकर ही उन्हें अपना बनाया जा सकता है। दंभपूर्ण बातों और आक्रामक तेवरों से लाभ कम होगा हानि ज्यादा।

(मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)
एल. एस. हरदेनिया
मंडेला से हमारे देश के उन लोगों को भी प्रेरणा लेना चाहिये जो सैकड़ों साल हुई घटनाओं का बदला वर्तमान लोगों से लेना चाहते हैं। जो इतिहास के बदले लेते हैं उनका स्थान इतिहास के कूड़ेदान में रहता है।

इंसानों की मुक्ति के लिए छेड़े गई जंग के सबसे बड़े योद्धा नेल्सन मंडेला अब हमारे बीच में नहीं रहे। उनका 05 दिसंबर 2013 को रात्रि के लगभग 8 बजे देहावसान हो गया। वे बीसवी शताब्दी के महानतम नेताओं में से एक थे। उन्नीसवी और बीसवी शताब्दी ने दुनिया के अनेक महान नेताओं कोजिनमें लैनिनहोचिमिनमाओत्सेतुंगमहात्मा गांधी और नेल्सन मंडेला शामिल हैं जन्म दिया था। शायद ही किसी महान व्यक्ति ने अपने आदर्शों और उसूलों के लिए इतने लंबे समय तक संघर्ष किया होजो नेल्सन मंडेला ने किया। विश्व के इतिहास में उनका अदभुत स्थान है।
दक्षिण अफ्रीका की फासिस्टी जेल से जब नेल्सन मंडेला रिहा हुए थे तब दुनिया के करोड़ों लोगों ने चैंधियाती आंखों से आश्चर्यचकित होकर देखा था कि हाड़-मांस का बना यह कैसा अद्भुत इंसान है जिसका दुनिया का क्रूरतम शासन 27 वर्ष की लंबी अवधि में बाल बांका भी नहीं कर सका।
आखिर यह कैसे संभव हुआ सत्ताईस वर्षों के दौरान अनेक बार दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने नेल्सन मंडेला से उन्हें रिहा करने का प्रस्ताव कियापरन्तु हर बार उन्होंने यह प्रस्ताव यह कहते हुए ठुकरा दिया कि अकेले मुझे आजाद करने से क्या  होगाजब मेरे सारे देशवासी एक तरह की जेल में रह रहे हों तो अकेले मेरी आजादी का क्या मतलब?“ संभवतः अपने देशवासियों के प्रति उनकी यही प्रतिबद्धता थी जिसने मंडेला को मौत के बीच भी जिन्दा रखा।
नेल्सन मंडेला का जन्म 18 जुलाई, 1918 को दक्षिण अफ्रीका के उमताती जिले के ट्रांसकाई नामक गांव में हुआ था। वे अपने क्षेत्र के एक संपन्न परिवार में जन्मे थे। पिता को अंग्रेजों द्वारा दंडित किए जाने के कारण मंडेला का बचपन विपरीत परिस्थितियों में बीता। वे अपने परिवार के पहले सदस्य थे जिसने अपने पिछड़े हुए समुदाय की सीमाओं को लांघकर एक स्कूल में दाखिला लिया। उसके बाद उन्होंने फोर्ट हारे विश्वविद्यालय के एक कॉलेज  में शिक्षा ग्रहण की। यह कॉलेज  मूलतः दक्षिण अफ्रीका के काले नवयुवकों के लिए था। इस कॉलेज को दक्षिण अफ्रीका के काले नौजवान आक्सफोर्डकेम्ब्रिज हार्वर्ड और येल“ का मिलाजुला संस्थान कहते थे।
अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस की स्थापना 1912 में हुई थी। इस संगठन का मुख्य उद्धेश्य दक्षिण अफ्रीका में गोरे लोगों के शासन का विरोध था।  मंडेला को यह महसूस हुआ कि उन्हें उन अपमानों को नहीं सहना चाहिए जो उनके समाज के अनेक लोग एक काला आदमी होने के नाते प्रतिदिन सहते हैं। मंडेला के दिमाग में अनेक नये-नये विचार आए और इसी तरह के विचारों और गतिविधियों के चलते उन्हें कॉलेज  से निष्कासित कर दिया गया। इसी बीच अपने कबीले के रीति-रिवाजों के अनुसार उनकी शादी तय हो गई परन्तु उन्हें इस तरह का विवाह स्वीकार नहीं था। इसलिए बिना किसी को बताए वे जोहेन्सबर्ग चले गए।
जोहेन्सबर्ग को सोने का शहर कहते हैं। उसके आसपास सोने की खदानें हैं। सोने की खदानों में काम करने वाले मजदूरों की दयनीय स्थिति देखकर मंडेला को जबरदस्त आक्रोश हुआ। सोने की खदानें चलाने वाले असीमित सम्पत्ति के मालिक बन गए थे। इन खानों में काम करने वाले मजदूरशोषण के शिकार थे। इसी बीचमंडेला ने एक वकील के यहां नौकरी कर ली। साथ-साथ उन्होंने अपनी शिक्षा भी पूरी की। इस दरम्यान उन्होंने शहरों की गंदी बस्तियों में रहने वालों के नरकीय जीवन को देखा। इसी बीच उनका संपर्क अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के नेताओं से हुआ। उनका संपर्क दक्षिण अफ्रीकी कम्युनिस्ट पार्टीदक्षिण अफ्रीकी इंडियन कांग्रेस इत्यादि अन्य संगठनों से भी हुआ !
इसके बाद मंडेला ने कानून की परीक्षा पास की। अपनी शिक्षा के दौरान उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि यदि उन्होंने वकालत शुरू कर दी तो वे एक ऐसे वर्ग के सदस्य बन जाएंगे जो अंग्रेजी साम्राज्य को स्थायित्व प्रदान करता है।
यद्यपि कई कम्युनिस्ट उनके मित्र थे तदापि उनकी आस्था थी कि अफ्रीकी राष्ट्रवाद से ही दक्षिण अफ्रीका को आजाद किया जा सकता है। 1944 में मंडेला ने अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस की यूथ लीग की सदस्यता स्वीकार की। इस संस्था का उद्धेश्य अफ्रीकी युवकों के दिलो-दिमाग में नयी स्फूर्ति पैदा करना था। इस बीच दक्षिण अफ्रीका में स्थितियां और बिगड़ती गईं। दक्षिण अफ्रीका की 87 प्रतिशत कृषि योग्य जमीन पर गोरों का कब्जा हो गया था। मूल निवासियों को गंदी बस्ती में रहने पर मजबूर किया जाने लगा। मूल अफ्रीकी निवासियों का मताधिकार भी छीन लिया गया। इस बात की उम्मीद थी कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद स्थितियों में परिवर्तन होगा परन्तु ऐसा नहीं हुआ। दक्षिण अफ्रीका की हालत और बिगड़ गई। दक्षिण अफ्रीका की नेशनल पार्टीजिसने दुसरे  विश्वयुद्ध के दौरान हिटलर का समर्थन किया थापुनः चुनाव जीत गई। इस पार्टी का नारा था- काले लोगों को देश से निकालो“ या कुली बनाओ
ऐसे मौके पर अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस पर एक नई जिम्मेदारी आ गई। उसने विकल्पों की तलाश शुरू कर दी। क्या अफ्रीकी राष्ट्रवाद अपने ही बल पर संघर्ष करता रहे या दूसरों के साथ जुड़ेमंडेला एक संतुलन बनाये रखना चाहते थे। वे चाहते थे कि जहां एक ओर अफ्रीकी राष्ट्रवाद का परचम लहराता रहेवहीं दूसरी ओर अन्य ताकतों से भी समन्वय स्थापित किया जाये। इस दरमियान दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार ने अनेक कानून बनाकर काले लोगों का भयंकर शोषण व दमन प्रारंभ कर दिया। इस समय तक अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस महात्मा गांधी के पदचिन्हों पर चल रही थी। वह  अहिंसक साधनों पर पूर्णरूपेण आस्था रखती थी।
उसकी इस अहिंसक वैचारिक अवधारणा का दक्षिण अफ्रीका की वहशी सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा। वहां की सरकार ने नये-नये कानून बनाये और नेशनल कांग्रेस ने अपने तौर-तरीके बदलने का फैसला किया। इस दरम्यान मंडेला को गंभीर प्रतिकूल परिस्थितियों में अपना जीवनयापन करना पड़ा। कभी ड्रायवरकभी होटल बाय इन विभिन्न रूपों में भूमिगत रहते हुये उन्होंने यह महसूस किया कि अब उन्हें अहिंसा का रास्ता छोड़ना पड़ेगा।
इसी बीच मंडेला ने माओचेगोवेरा आदि क्रांतिकारियों के विचारों और जीवन का अध्ययन किया। अहिंसा का रास्ता त्यागने के बाद अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस और नेल्सन मंडेला ने सरकारी संस्थानों में तोड़-फोड़ का कार्यक्रम हाथ में लिया। मंडेला ने यह तय किया कि व्यक्तियों को नहीं सरकारी संस्थाओं को निशाना बनाना चाहिए। मंडेला द्वारा हिंसा का रास्ता अपनाने के बाद दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने सघन जवाबी कार्यवाही शुरू कर दी। गोरी पुलिस उनका पीछा करती थी परन्तु वे हमेशा पुलिस को छकाते रहे। इन गंभीर परिस्थितियों के बीच उन्होंने कुछ दिनों के लिए दक्षिण अफ्रीका छोड़ दिया और अफ्रीका महाद्वीप के अनेक देशों के नेताओं से संपर्क के लिए लम्बी यात्रा प्रारंभ की। उन्होंने अफ्रीकी देशों के एक सम्मेलन में भी भाग लिया। अपनी महायात्रा के दौरान वे जाम्बियातन्जानियाँट्युनिशियाअलजीरियामोरक्कोसेनेगललाइबेरिया आदि गये। इन समस्त देशों में उन्होंने अपने आंदोलन के लिये समर्थन जुटाया। अपने प्रवास के दौरान वे मिस्त्र भी गये। वहां उन्होंने मिस्त्र के राष्ट्रपति नासिर द्वारा उठाये गये अनेक क्रांतिकारी कदमों का अध्ययन किया। उन्हें नासिर की उद्योगों के राष्ट्रीयकरण की नीति काफी पसंद आई। अफ्रीकियों के बारे में प्रायः यह कहा जाता है कि उनकी कोई सभ्यता-संस्कृति नहीं है। मिस्त्र में मंडेला को जो कुछ देखने को मिलाविशेषकर वहां की महान कलाकृतियां और वास्तु तथा वहां पाये गये विकसित सभ्यता के अन्य अवशेषउससे उन्हें यह ज्ञात हुआ कि जब यूरोप के निवासी गुफाओं में निवास कर रहे थे तब मिस्त्रदुनियाँ  का एक अत्यधिक विकसित राष्ट्र था। मंडेला को अनेक अफ्रीकी देशों ने उनके संघर्ष में सहयोग का आश्वासन दिया। अपने अफ्रीका प्रवास के दौरान उन्होंने सैनिक प्रशिक्षण भी प्राप्त किया।
1962 में वे दक्षिण अफ्रीका वापस आ गये परन्तु थोड़े ही दिनों में उन्हें अफ्रीका की गोरी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उन पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें आजन्म कारावास की सजा दी गई। उनपर आरोप था कि उन्होंने दक्षिण अफ्रीकी सरकार के विरुद्ध लोगों को भड़काया और बिना पासपोर्ट के अनेक देशों की यात्रा की। अपने जेल के दिनों का विवरण देते हुए वे अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि पुलिस अत्यधिक वहशियाना ढंग से व्यवहार करती थी। बिना किसी कारण कैदियों को पीटती थीउनको घुटन भरे स्थानों पर रखती थी और उन्हें बिजली का शॉक भी देती थी।
कुछ दिनों में नेल्सन मंडेला को राबिन नाम के द्वीप में भेज दिया गया। इस द्वीप में दक्षिण अफ्रीका का सर्वाधिक सुरक्षित जेल था। यहां नेल्सन मंडेला को नारकीय यातनाएं दी गई। राबिन द्वीप में नौ महीने रहने के बाद उन पर पुनः एक मुकदमा लाद दिया गया। इस मुकदमें में उन पर दक्षिण अफ्रीका की सरकार के विरुद्ध षड़यंत्र रचने का आरोप लगाया गया। अदालत ने उन्हें फिर से आजीवन कारावास की सजा दी।
नेल्सन मंडेला ने अपने जेल के दिनों का दिल दहला देने वाला वर्णन अपनी आत्मकथा में किया है। यह विवरण इतना मार्मिक है कि आने वाली पीढि़यां उसे एक उपन्यास की तरह पढ़ेंगी। मंडेला लिखते हैं कि हमें एक अंधेरी कोठी में रखा जाता था। उसमें न कोई बिस्तर रहता थान कुर्सीन पानी और न शौच की सुविधा। खाना ऐसा दिया जाता था जिसे पशु भी न खा सकें। इन नारकीय स्थितियों के बावजूद अफ्रीकी कैदियों और जेल वार्डनों में दिन-रात झगड़े की स्थिति बनी रहती थी। मंडेला को तेरह वर्षों तक एक खदान में काम करने के लिये मजबूर किया गया। खान के मजदूर प्रायः कोई न कोई गाना गाते रहते थे। इनमें से अनेक गीत राष्ट्रीय भावनाओं को जागृत करने वाले होते थे। इस तरह के गानों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। फिर मजदूरों ने सीटी बजाकर गीत गाना प्रारंभ किया तो सीटी बजाना प्रतिबंधित कर दिया गया। एक अवसर तो ऐसा भी आया जब मजदूरों के बीच आपसी बातचीत भी बंद करवा दी गई।
जेल में मंडेलाकैदियों के नेता के रूप में उभर कर आये। समस्त कैदियों ने एक संकल्प द्वारा जेल के भीतर व्याप्त तानाशाही के विरुद्ध आवाज उठाई। कैदियों की मांग थी कि उनके रहन-सहन की स्थितियों में सुधार किया जाये। 1977 में मंडेला से खदानों में काम करवाना बंद करवा दिया गया। उन्हें पढ़ने लिखने की और टेनिस खेलने की इजाजत दे दी गई। 1982 में उन्हें रोबिन द्वीप से हटाकर केपटाउन के पास स्थित एक जेल में भेज दिया गया। इसी बीच मंडेला ने यह तय किया कि दक्षिण अफ्रीका की सरकार से बातचीत की जायेपरन्तु उनकी यह पहल खतरों से भरपूर थी। प्रश्न यह था कि यदि वे बातचीत करेंगे तो यह आरोप तो नहीं लगेगा कि वे बिक गये हैं।
उस समय मंडेला अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष भी नहीं थे। नेल्सन मंडेला का स्वभाव ही था खतरों से खेलना। इसलिये उन्होंने समस्त संभावित खतरों के बावजूद दक्षिण अफ्रीका की सरकार से बातचीत करना उचित समझा। इस दरम्यान समस्त दक्षिण अफ्रीका में चारों तरफ राजनैतिक हिंसा और अराजकता का वातावरण निर्मित हो गया। देश पर शासन करना असंभव हो गया । बातचीत का नतीजा निकला और अंततः दक्षिण अफ्रीका की एक आततायी शासन से मुक्ति की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई। अनेक रंगभेद संबंधी कानून रद्द किये जाने लगे। तीस प्रतिबंधित संगठनों पर से प्रतिबंध उठा लिये गये और अंततः 10 फरवरी 1990 को 27 वर्ष तक जेल की यातना सहने के बाद मंडेला को रिहा किया गया।
उनकी जेल यात्रा तो समाप्त हुई परन्तु नेल्सन मंडेला जानते थे कि भविष्य का रास्ता कितना कठिन है। मुठ्ठीभर गोरे अल्पसंख्यकों ने दक्षिण अफ्रीका के बहुसंख्यकों पर सैकड़ों वर्ष नाना प्रकार के अत्याचार किये थे। दक्षिण अफ्रीका की धरती पर ही महात्मा गाँधी को अत्यधिक कमाई का धंधा-वकालत-छोड़कर साम्राज्यवादियों के विरुद्ध एक लंबा संघर्ष छेड़ने की प्रेरणा मिली थी। अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस और मंडेला वर्षों तक महात्मा गाँधी के रास्ते पर चले थे परन्तु जब दक्षिण अफ्रीका की नस्लवादी सरकार की अत्याचारी गतिविधियां दिन-प्रतिदिन बढ़ती गईनिहत्थे लोगों पर कातिलाना हमले होते रहेबोलनेलिखने और संगठित होने के अधिकार पूरी तरह छीन लिये गयेखुद की ही धरती पर खुद के ही देश में दक्षिण अफ्रीका के बहुसंख्यक नागरिकों को लगभग जेल जैसी स्थितियों में रहने पर मजबूर किया गया तो अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस और नेल्सन मंडेला ने हथियार उठाना उचित समझा।
इस लंबे काल में वहां के मूल निवासियों और मुट्ठीभर गोरे लोगों के सबंध अत्यधिक कटु हो गए थे। मंडेला के सामने सबसे बड़ी समस्या यही थी कि इन दोनों नस्लों के बीच इस पारस्परिक घृणा को कैसे समाप्त किया जाये। इस मामले में मंडेला ने अत्यधिक मानवीय उदारता का परिचय दिया।  उनका कहना था कि जब तक हम भूतकाल को भुलायेंगे नहींतब तक उज्जवल भविष्य का निर्माण संभव नहीं है।
नेल्सन मंडेला का व्यक्तित्व कितना उदार है इसका एक उदाहरण यहां पर प्रस्तुत करना उचित होगा। एक भव्य समारोह में नेल्सन मंडेला की राष्ट्रपति के रूप में शपथ होनी थी। समारोह में अनेक देशों के राष्ट्रपतिप्रधानमंत्रीराजामहाराजा उपस्थित थे। इसी बीच मंडेला ने घोषणा की कि वे सभा का परिचय उनके दो महत्वपूर्ण मेहमानों से करवाएंगे। जिस समय कार्यक्रमस्थल अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों से भरा होवह भी ऐसे अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों से जो एक दूसरे को जानते होंउस समय मंडेला का यह कहना कि वे अपने दो अत्यधिक महत्वपूर्ण मेहमानों से परिचय करवायेंगेएक चैंकाने वाली बात थी। इसके बादअपने दोनों ओर खड़े दो गोरे सिपाहियों का परिचय कराते हुये मंडेला ने बताया कि ये दो व्यक्ति ही मेरे महत्वपूर्ण अतिथि हैं। मेरे जेल के दिनों में इन दोनों ने मुझे विभिन्न किस्म की यातनाएं दी थीं। मैं इस बात को जानता हूं कि इन्होंने स्वयं की पहल पर ऐसा नहीं किया था इसलिये मैं इन दोनों को आज क्षमा कर रहा हूं और इनके माध्यम से मैं उन तमाम गोरे लोगों को क्षमा कर रहा हूं जिन्होंने कभी न कभी इस देश के बहुसंख्यक निवासियों पर जुल्म किये थे। मैं चाहता हूँ कि इस देश के समस्त मूल निवासी हमारे पूर्व गोरे शासकों को माफ कर दें। हम जानते हैं कि उन्हें हमारे बीच रहना है और इसलिये क्यों न हम मिल-जुलकरअतीत को भुलाकर रहें। कड़वा इतिहास भुलाना ही उचित होता है।
नेल्सन मंडेला इस दिशा में सतत प्रयासरत हैं। गाँधी जी भी कहा करते थे कि हमारी नाराजगी अंग्रेज साम्राज्य से है अंग्रेजों से नहीं। महात्मा गाँधी के दिखाये इसी मार्ग पर मंडेला चल रहे हैं। मंडेला से हमारे देश के उन लोगों को भी प्रेरणा लेना चाहिये जो सैकड़ों साल हुई घटनाओं का बदला वर्तमान लोगों से लेना चाहते हैं। जो इतिहास के बदले लेते हैं उनका स्थान इतिहास के कूड़ेदान में रहता है।

एल.एस.हरदेनिया

दिनांक 23-24 नवंबर को इलाहाबाद में आयोजित एक विशाल सम्मेलन में यह तय किया गया कि इस बात के सघन प्रयास किए जायें कि शीघ्र प्रारंभ होने वाले संसद के अधिवेशन में साम्प्रदायिक और लक्षित हिंसा (न्याय और पुनर्वास तक पहुँच) विधेयक राज्यसभा में पेश हो जाएं। इस उद्देश्य से तुरंत एक राष्ट्रव्यापी अभियान प्रारंभ किया जाएगा। इस अभियान के दौरान सांसदों से मुलाकात की जाएगी, विभिन्न पार्टियों के मुखियाओं से भी संपर्क किया जाएगा। इसी तरह से यह प्रयास किया जाएगा कि मीडिया में इस बात का प्रचार हो कि यह विधेयक क्यों आवश्यक है?

 विधेयक को राज्यसभा में पेश किए जाने के सुझाव के पीछे एक प्रमुख कारण है। नियम के अनुसार लोकसभा में जो भी विधेयक विचारार्थ लंबित रहते हैं वे लोकसभा के भंग होने की स्थिति में मृतप्राय हो जाते हैं। चूँकि राज्यसभा एक स्थाई सदन है इसलिए राज्यसभा में जो भी मामला लंबित रहता है उस पर सदन को आवश्यक रूप से विचार करना होता है। इसलिए राज्यसभा में पेश किए जाने पर जोर दिया जा रहा है। यह भी सुझाव आया कि यदि सरकार इस विधेयक को राज्यसभा में प्रस्तुत करने के लिये राजी नहीं होती है तो उसे प्राईवेट मेंबर विधेयक के रूप में पेश करवाया जाए।

विधेयक की कुछ खास बातें निम्न प्रकार हैं :

यह विधेयक किसी भी राज्य में धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों तथा दलित और आदिवासियों की संगठित और लक्षित साम्प्रदायिक हिंसा से रक्षा का वादा करता है।

अल्पसंख्यक या कमजोर समुदाय के खिलाफ नफरत भरे भाषण, बयानबाजी या लेखन की शुरूआत साम्प्रदायिक हिंसा के बहुत पहले हो जाती है। यही प्रचार असली हिंसा के लिये ईंधान मुहैया कराता है। हालाँकि आई.पी.सी. की धारा 153ए के तहत इस तरह के भडकाऊ भाषण या लेखन के खिलाफ सजा तजवीज की गई है लेकिन यह विधेयक नफरत भरे प्रचार को फिर से परिभाषित करता है। इसी तरह यह अन्य कई अपराधों की फिर से परिभाषा करता है जैसे-यन्त्रणा, लैंगिक हिंसा, संगठित एवं लक्षित साम्प्रदायिक हिंसा, कर्तव्य न निभाना और अपने से नीचे के अधिकारियों को आदेश देने में देर या कोताही करना। इस विधेयक में साम्प्रदायिक हिंसा के दौरान महिलाओं पर होने वाले जुल्म पर विशेष धयान दिया गया है।

आज से 15 साल पहले एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा था कि कोई भी दंगा 24 घंटे से ज्यादा नहीं चल सकता अगर राज्य उसे न चलाना चाहे।राज्य के पक्षपातपूर्ण होने और हिंसा में हिस्सा लेने के बारे में यह एक भीतरी आदमी का ईमानदार बयान था। इस बयान के बाद की कई जाँच कमेटियों और अधिकारियों के बयान से इस बात की पुष्टि होती है। दंगों के वक्त पुलिस-प्रशासन की अनदेखी या पक्षपात से न केवल दंगा बढ़ता चला जाता है बल्कि पुनर्वास भी असंभव हो जाता है। नतीजा होता है भारतीय लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था से लोगों का भरोसा उठ जाना। भारतीय कानून के इतिहास में पहली बार ऊँचे पदों पर बैठे नौकरशाहों को भी आदेश देने में कोताहीके लिये दायरे में लिया गया है। अगर कहीं साम्प्रदायिक हिंसा की वारदात होती है तो उन नौकरशाहों पर भी मुकदमा चलाया जा सकता है जिनके नीचे आने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों ने अपना कर्तव्य पालन नहीं किया और हिंसा को भड़कने दिया। दूसरे शब्दों में बड़े अधिकारियों को भी हिंसा के भड़कने और फैलने के मामलों में जिम्मेदार बनाया गया है।

साम्प्रदायिक हिंसा के दौरान होने वाले नुकसान की भरपाई के लिये यह विधेयक मुआवजे और पुनर्वास के ठोस नियम बनाता है। ताकि यह किसी सरकार के रहमोकरम पर निर्भर न रहे। यह नियम सभी के लिये है चाहे वह अल्पसंख्यक समुदाय का हो या बहुसंख्यक समुदाय का। विधेयक सरकार को वैधानिक रूप से मजबूर करता है कि वह किसी भी हालत में एक महीने के भीतर मुआवजे का भुगतान करे। मुआवजे के लिये न्यूनतम मानक भी तय किये गये हैं जैसे मृत्यु के लिये 15 लाख, बलात्कार के लिये 5 लाख, गंभीर रूप से घायल के लिए 2 लाख, मानसिक प्रताड़ना और अवसाद के लिये 3 लाख। सम्पत्ति नष्ट होने, घर या व्यापार की हानि होने पर दिया जाने वाला मुआवजा महँगाई की दर के साथ बदला जायेगा। जबरन बेदखली, घर या व्यापार पर जबरन कब्जा हो जाने और अवसरों के खत्म होने पर भी मुआवजे की व्यवस्था है।

नये कानून को लागू करने में सहायता के लिए राष्ट्रीय प्राधिकरण की स्थापना की जाएगी। इसका नाम होगा साम्प्रदायिक सद्भाव, न्याय और पुर्नवास के लिए राष्ट्रीय प्राधिकरण।ऐसे ही प्राधिकरण राज्यों में भी बनाये जाएंगे। भारतीय राज्य के संघात्मक ढांचे के मद्देनजर राष्ट्रीय प्राधिकरण राज्यों को बाधय तो नहीं कर सकता लेकिन वह न्यायालय से राज्यों के लिए निर्देश प्राप्त कर सकता है। राष्ट्रीय प्राधिकरण में सात सदस्य होंगे जिसमें से 4 अल्पसंख्यक, महिला, दलित और आदिवासी तबके के होंगे।

यह एक चौंकाने वाली बात है कि जब भी इस विधेयक के पेश होने की संभावना बनती है संघ परिवार की ओर से शोर मचाना शुरू कर दिया जाता है। संघ परिवार की ओर से प्रचारित किया जाने लगता है कि बुनियादी रूप से यह विधेयक हिन्दू विरोधी है। यह दावा किया जाता है कि दंगा कोई भी करे सजा हिन्दू को ही होगी।

विधेयक से कौन डरता है?
             
अभी विधेयक संसद के सामने पहुँचा भी नहीं कि इसके खिलाफ दुष्प्रचार शुरू हो गया। यह भी आरोप लगाया जाना लगा कि यह भारतीय समाज को बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दो भागों में बांट देगा। यह अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा किये गये साम्प्रदायिक अपराधों की अनदेखी करता है। यह दुष्प्रचार उन्हीं के द्वारा किया जा रहा है जो आमतौर पर नफरत की राजनीति ही करते हैं। जिन्होंने संख्याबल या सामाजिक ताकत के मार्फत लोकतंत्र को अगवा करने की हमेशा कोशिश की है।

इसे समझने के लिए हमें प्रातिनिधिक लोकतंत्र की बारीकियों को समझना होगा। यह लोकतंत्र तभी अपने को सही लोकतंत्र के रूप में स्थापित कर सकता है जब यह अल्पसंख्यक या सामाजिक रूप से कमजोर तबकों की रक्षा एवं बराबरी का दावा कर सके। लेकिन इतिहास गवाह है कि चाहे वह कश्मीर के पंडित हों, गुजरात के मुसलमान हों, उड़ीसा के ईसाई हों, दिल्ली के सिख हों या खैरलाजी के दलित, हमेशा बहुसंख्या की ताकत से दबाये गये हैं। वे न केवल साम्प्रदायिक हिंसा के शिकार हुए हैं बल्कि उन्हें आज तक इंसाफ नहीं मिला है। हालात और बिगड़े हुए महसूस होते हैं जब हम देखते हैं कि इन घटनाओं में राज्य के जिम्मेदार पदाधिकारी न केवल हिंसा को रोकने में नाकाम रहे बल्कि उन्होंने हिंसक गुटों का साथ भी दिया। उन्होंने पीड़ितों तक इंसाफ पहुंचने के रास्ते में भी बाधाएँ खड़ी की। हद तो तब हो गई जब चुनावों का इस्तेमाल साम्प्रदायिक धा्रुवीकरण बढ़ाने के लिए किया गया। साम्प्रदायिक हिंसा को जायज ठहराने के लिए बहुमत के तर्क का इस्तेमाल किया गया। ऐसे माहौल में क्या जरूरी नहीं हो जाता कि लोकतंत्र के बहुमत वाले तर्क को कानून और संविधान के बराबरी वाले तर्क से ठीक किया जाये। अगर भीड़ किसी इंसान को घेर कर मार देती है तो हम यह तर्क नहीं दे सकते कि भीड़ इसलिए हत्यारी नहीं है चूंकि वह बहुमत में है। विधेयक हमारे लोकतंत्र को एक जरूरी संतुलन देता है। वह समाज को अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक में बांटता नहीं बल्कि पहले से ही बंटे हुए समाज में संवैधानिक बराबरी और कानून के शासन का पुल बाँधाता है।

 यह विधेयक बहुसंख्यकों के विरूध्द नहीं है बल्कि यह राज्य की मशीनरों को अल्पसंख्यकों और सामाजिक रूप से कमजोर तबकों के लिए संवेदनशील और जवाबदेह बनाने की पहल है। यह अल्पसंख्यकों और सामाजिक रूप से कमजोर तबके के लिये विशेष चिंता दिखाता है। क्योंकि इन तबकों की सामाजिक पहचान की वजह से ही उन्हें सामूहिक हिंसा का शिकार बनाया जाता है। यह इस बात की ताईद करता है कि वही लोकतंत्र सफल हो सकता है जिसमें इंसाफ और बराबरी सामाजिक ताकत के हिसाब से नहीं बल्कि नागरिक होने के नाते मिलते हैं। इस विधेयक के खिलाफ झूठा प्रचार करने वाले वही हैं जिन्हें हमारी तहजीब, लोकतंत्र और संविधान में विश्वास नहीं।

 हम क्या करें?
              
 यह विधेयक बनने के बाद ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। इस पर बहस हो और यह कानून बन सके इसके लिए विभिन्न दलों में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। एक राष्ट्रीय अभियान शुरू किया गया है ताकि विधेयक को संसद में रखा जाये और इस पर पूरे देश में चर्चा हो सके।

 हमारा संविधान कहता है कि राज्य किसी भी व्यक्ति से धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता। साथ ही संविधान हर व्यक्ति की कानून के सामने समानता का भी वादा करता है। लेकिन हालात इतने जटिल हैं। खासकर साम्प्रदायिक हिंसा के मामलों में राज्य व उसके अमले न केवल भेदभाव करते पाये जा रहे हैं बल्कि खुलकर अत्याचारियों का साथ दे रहे हैं। ऐसे में संविधान, लोकतंत्र और साझा संस्कृति के उसूलों में यकीन करने वाले सभी व्यक्तियों, संगठनों और समूहों की यह जिम्मेदारी बनती है कि साम्प्रदायिक एवं सामाजिक भेदभाव की बीमारी को निकाल फेकें और एक स्वस्थ लोकतंत्र के निर्माण के लिए आगे बढ़ें। साम्प्रदायिक और लक्षित हिंसा (न्याय और पुर्नवास तक पहुँच) विधेयक 2011 को कानून बनाने की मुहिम में शामिल हों। शायद संघ परिवार एवं अन्य समूह को यह लगता होगा कि यदि इस विधेयक के कानून बनने से दंगे रूक जाते हैं तो उनके हाथ से एक ऐसा मुद्दा छिन जायेगा जो धर्म और आस्था के नाम पर समाज को धा्रुवीगत करता है और फिर उससे राजनैतिक लाभ उठाता है।

विनीत तिवारी 

जब मैं सत्रह बरस का हुआ
तब तक चार बार प्रेम कर चुका था
और हर बार घरवालों के हाथों पकड़ा जाकर पिट चुका था।
जब मैं सत्रह बरस का हुआ
तब तक 12 जमातें पास कर चुका था
और पूत के पाँव
जो पालने में हर माँबाप को शानदार ही नज़र आते हैं
अपनी असल शक्ल दिखाने लगे थे।
जब मैं सत्रह बरस का हुआ
तब तक घर वालों से किताबें ख़रीदने के लिए
ली गयी उनकी मेहनत की कमाई को धुएँ में उड़ा चुका था।
जब मैं सत्रह बरस का हुआ तब तक मैने हंस, पहल, वसुधा, इत्यादि का नाम भी नहीं सुना था
और तब तक 22 के हो चुके भाई का
खुफिया जगहों पर छिपाया हुआ अष्लील साहित्य पढ़ चुका था।
जब मैं सत्रह बरस का हुआ तो ऐसा नहीं था कि मैं पूरी तरह बर्बाद हो चुका था
क्योंकि आज मैं ठीकठाक ही
एक जि़म्मेदार  इंसान की हैसियत से इस दुनिया में मौजूद हूँ।
तो ज़ाहिर है कि मैंने बरास्ते 27
17 से 37 के होतेहोते
और कुछ भी किया हो, नफ़रतें नहीं सीखीं थीं
और शायद मेरे आसपास के ज़्यादातर लोगों ने भी और जो भी बदमाषियाँ वगैरह की हों
नफ़रतें उन्होंने भी नहीं सीखी थीं।
जब इमरान सत्रह बरस का हुआ
उसके पहले से ही इष्क जैसी चीज़ पर भूख भारी पड़ चुकी थी।
जब इमरान सत्रह बरस का हुआ
तब तक उसके घरवालों को कई मुहल्ले बदलकर
आखि़रकार  एक ऐसे मुहल्ले में अपना नया घर लेना पड़ा था
जहाँ बाक़ी लड़कों के नाम भी ज़ीषान, सुलेमान, सुल्तान जैसे होते थे।
जब इमरान सत्रह बरस का हुआ
तो वो पढ़ने की विलासिता छोड़कर
बिल्डिंगों में सरिये बाँधना सीख चुका था
और छोटे भाई छोटू को काम सिखा रहा था
अपने अब्बू के एक्सीडेंट की वजह से बेपटरी हुए घर को पटरी पर ला रहा था।
जब इमरान सत्रह बरस का हुआ
तो उसी बरस के किसी एक दिन
कफ्र्यू लगने की ख़बर पाकर वो काम से घर जा रहा था
जब पुलिस के ही किन्हीं नफ़रतज़दा हाथों ने
उसके मजहब की तहक़ीकात कर
बंदूक की नाल उसके मुँह में घुसाकर घोड़ा दबा दिया।
इस तरह इमरान जो बरास्ता 27
17 से 37 के होतेहोते
मुझसे बेहतर और जि़म्मेदार इंसान बन सकता था
उसे हमने, हमारी सारी दुनिया ने खो दिया।
और अब मैं हूँ,
जो कमतर हूँ उससे
लेकिन चूँकि मेरा नाम इमरान, रिज़वान या शफ़ीक
या थॉमस या जॉर्ज जैसा कुछ नहीं है
इसलिए इस हिन्दुस्तान में मेरे रहने की उम्मीदें कुछ ज़्यादा हैं
हालाँकि वो भी तब तक
जब तक मैं अपनी ये इमरानइमरान वाली कविता ज़्यादा सुनाऊँ।
जावेद अनीस


हमारे संविधान की उद्देशिका के अनुसार भारत एक समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य है। संविधान के अनुसार राजसत्ता का कोई अपना धर्म नहीं होगा। उसके विपरीत संविधान भारत के सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने का अधिकार प्रदान करता है। 
लेकिन मध्यप्रदेश में इसका ठीक इसका बिलकुल उल्टा हो रहा है।पिछले करीब एक दशक से भाजपा शासित सूबे मध्य प्रदेश में शिक्षण संस्थानो में एक खास तरह का राजनीतिक एजेंडा बड़ी खामोशी से लागू किया जा रहा है। 
HT $ August 2013
इस की ताजा बानगी एक बार फिर से तब देखने को मिली जब बीते 1 अगस्त 2013 को प्रदेश की शिवराज सिंह सरकार ने मध्यप्रदेश राजपत्र में अधिसूचना जारी कर मदरसों में भी गीता पढ़ाया जाना अनिवार्य कर दिया था, जिसमें मध्यप्रदेश मदरसा बोर्ड से मान्यता प्राप्त सभी मदरसों में कक्षा तीन से कक्षा आठ तक सामान्य हिन्दी की तथा पहली और दूसरी की विशिष्ट अंग्रेरजी और उर्दू की पाठयपुस्तकों में भगवत गीता में बताये प्रसंगों पर एक एक अध्याय जोड़े जाने की अनुज्ञा की गयी थी और इसके लिए राज्य के पाठ्य पुस्तक अधिनियम में बकायदा जरूरी बदलाव भी किए गए थे। विधानसभा चुनावों से मात्र चार महीने पहले लिए गए इस फैसले ने बड़ा विवाद पैदा कर दिया था और खुद को भाजपा के वाजपेयी इन वेटिंगबनाने में लगे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भारी विरोध और अपनी अपेक्षाकृत उदार छविको नुकसान पहुचने के डर के चलते बड़ी आनन फानन में अपना निर्णय वापस लेना पड़ा। 
दरअसल मध्य प्रदेश के सरकारी स्कलों में पहले से ही गीता पढ़ाई जा रही है. राज्य सरकार द्वारा 2011 में गीता को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने की घोषणा की थी. इंदौर में 13 नवंबर 2011 को स्कूलों में गीता पढ़ाने के निर्णय की घोषणा करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा था कि हिन्दुओं का पवित्र ग्रन्थ गीतास्कूलों में पढ़ाया जाएगा भले ही इसका कितना ही विरोध क्यों न हो।इसका भी नागरिक संगठनो और अल्पसंख्यक समाज द्वारा पुरजोर विरोध किया था। यह मामला हाई कोर्ट तक भी गया था। यह दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि माननीय उच्च न्यायालय ने मध्यप्रदेश शासन के राज्य के स्कूलों में गीता सारपढ़ाने के निर्णय पर अपनी मुहर लगाते हुए कहा कि गीता मूलतः भारतीय दर्शन की पुस्तक हैकिसी भारतीय धर्म की नहीं। । अदालत का यह निर्णय कैथोलिक बिशप काउंसिल द्वारा दायर एक याचिका पर आया था जिसमें यह मांग की गई थी कि केवल गीता ही नहीं बल्कि सभी धर्मों में निहित नैतिक मूल्यों से स्कूली विद्यार्थियों को परिचित कराया जाना चाहिए। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि चूंकि गीता दार्शनिक ग्रंथ है,धार्मिक नहीं इसलिए राज्य सरकार गीता का पठन-पाठन जारी रख सकती है और स्कूलों में अन्य धर्मों द्वारा प्रतिपादित नैतिक मूल्यों का ज्ञान दिया जाना आवश्यक नहीं है। इस आदेश के बाद सरकार के शिक्षा विभाग का हौसला बढा जिसका परिणाम ये एक अगस्त की अधिसूचना थी जिसमें गीता के पाठ पढाये जाने को मदरसों में भी अनिवार्य बनाया गया था।

इसी तरह राज्य सरकार ने शासकीय स्कूलों में योग के नाम पर सूर्य नमस्कारअनिवार्य कर दिया गया था बाद में उसे ऐच्छिक विषय बना दिया गया। परंतु चूंकि अधिकांश हिन्दू विद्यार्थी शालाओं में योग सीखते हैं अतः अल्पसंख्यक छात्र-छात्राओं का स्वयं को अलग-थलग महसूस करना स्वभाविक ही होगा। इसी तरह स्कूल शिक्षकों के लिए ऋषि संबोधन चुना गया था।
इसी कड़ी में राज्य की शिक्षा मंत्री अर्चना चिटनिस द्वारा राज्य के सभी सरकारी स्कूलों को दिया गया यह आदेश भी काफी विवादित रहा था कि स्कूलों में मिड डे मील के पहले सभी बच्चे भोजन मंत्र पढ़ेंगे. 
इसी तरह से वर्ष 2009 में मध्य प्रदेश सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पत्रिका देवपुत्र को सभी स्कूलों में अनिवार्य तौर पर पढ़ाए जाने का फैसला लिया था। 
हाल ही में इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए बीते 29 जुलाई 2013 को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मध्यप्रदेश योग परिषद की बैठक को संबोधित करते हुए घोषणा की थी कि प्रदेश की शालाओं में पहली से पांचवी कक्षा तक योग शिक्षा अनिवार्य की जाएगीउन्होंने योग परिषद को निर्देश भी दिया की वह व्यवहारिक और सिद्धांतिक योग शिक्षा के लिए पाठयक्रम तैयार करे ! 
ऐसा लगता है की सरकार की दिलचस्पी शालाओं में शिक्षा का स्तर सुधारने के बजाये इस तरह के विवादित फैसलों को लागू करने में ज्यादा रहती है, अगर सरकार इसी तत्परता के साथ शिक्षा की स्थिति को लेकर गम्भीर होती तो प्रदेश में शिक्षा का हाल इतना बदहाल नहीं होता।शिक्षा का अधिकार कानून लागू हुए तीन साल बीत चुके हैं लेकिन प्रदेश अभी भी बच्चों को शिक्षा का अधिकार देने में काफी पीछे है। म.प्र में शिक्षा की स्थिति कितनी गंभीर है इसका अंदाजा इन कुछ आकड़ों से लगाया जा सकता है। 
म.प्र शिक्षकों की कमी के मामले में देश में दूसरे स्थान पर है, शिक्षा के अधिकार कानून के मानकों के आधार पर देखा जाये तो म.प्र. में 42.03 प्रतिशत शिक्षकों की कमी है इस मामले में प्रदेश, अरुणाचल के बाद दूसरे स्थान पर है। 
असर रिर्पोट 2012 के अनुसार म.प्र उन बद्तर राज्यों में चोथे नम्बर पर है जहाँ कक्षा 3 से 5 तक के केवल 23.1 प्रतिशत बच्चे ही गणित में घटाव कर सकते हैं जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 40.7 प्रतिशत है। इसी प्रकार म.प्र उन पांच बद्तर राज्यों में शामिल है जहाँ कक्षा 3 से 5 तक के केवल 39.3 प्रतिशत बच्चे ही कक्षा 1 की किताब पढ़ सकते हैं। म.प्र में 8 कक्षा के केवल 24 प्रतिशत विधार्थी ऐसे है जो अंग्रेजी में वाक्य पढ़ सकते हैं। उपरोक्त आकड़ों से साफ़ जाहिर है की सूबे के स्कूलों में पढाई के नाम पर महज खानापूर्ति हो रही है। 
दूसरी तरफ प्रदेश के शालाओं में बुनियादी अधोसंरचना की भी भारी कमी है प्रदेश के 52.52 प्रतिशत शालाओं के पास स्वंय का भवन नही है, प्रदेश के 24.63 प्रतिशत प्राथमिक एवं 63.44 प्रतिशत माध्यमिक शालाओं में पानी की उपलब्ध्ता नहीं है, प्रदेश के 47.98 प्रतिशत प्राथमिक एवं 59.20 प्रतिशत माध्यमिक शालाओं में शौचालय की अनुपलब्धता है। 
मध्यान भोजन को लेकर भी स्थिति अच्छी नहीं है,मध्यप्रदेश में पिछले साल मध्यान भोजन को लेकर किये गए शिकायतों में से 70 फीसदी शिकायतों पर कार्रवाई नहीं हुई है। तीन साल के आंकड़े देखे तो राज्य शासन तक 239 शिकायतें पहुंची। जिसमें से 90 शिकायतों पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है । 
उपरोक्त स्थितियां बताती है मध्यप्रदेश में सभी बच्चों को शिक्षा का अधिकार देने को लेकर अभी कितना लम्बा सफ़र तय करना है । लेकिन वर्तमान सरकार की दिलचस्पी प्रदेश की शिक्षा सुधारने की जगह किसी ख़ास विचारधारा का एजेंडा लागू करने में ज्यादा दिख रही है । प्रदेश के बच्चों और शिक्षा व्यवस्था के लिए यह दुर्भाग्य है कि शालाओं को इस तरह के राजनीति का अखाड़ा बनाया जा रहा है । 
आम तौर पर खुद को विनम्र और सभी वर्गों का सर्वमान्य नेता दिखाने की कोशिश में लगे रहने वाले भाजपा के वाजपेयी इन वेटिंगशिवराजसिंह चौहान बड़ी मुस्तैदी और सावधानी के साथ प्रदेश में संघ का एजेंडा लागू कर रहे है । 
लेकिन जरूरत इस बात की है कि मध्य प्रदेश में शिक्षा को धर्म के साथ घाल- मेल करने की कवायद पर रोक लगायी जाये और शिक्षा में आने वाले वास्तविक अडचनों को दूर करने के लिए गंभीरता से पर्यास किए जायें ताकि सूबे के सभी बच्चों को अनिवार्य और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लक्ष्य हासिल किया जा सके । 


 सुभाष गाताड़े 
1997 में आयी वह आत्मकथा ‘‘जूठन’’ आते ही चर्चित हुई थी। उस वक्त एक सीमित दायरे में ही उसके लेखक ओमप्रकाश वाल्मिकी का नाम जाना जाता था। मगर हिन्दी जगत में किताब का जो रिस्पान्स था, जिस तरह अन्य भाषाओं में उसके अनुवाद होने लगे, उससे यह नाम दूर तक पहुंचने में अधिक वक्त नहीं लगा। यह अकारण नहीं था कि इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई के मध्य में वह किताब अंग्रेजी में अनूदित होकर कनाडा तथा अन्य देशों के विश्वविद्यालयों के पाठयक्रम में शामिल की गयी थी।

उपरोक्त आत्मकथा ‘‘जूठन’ का वह प्रसंग शायद ही कोई भूला होगा, जब सुखदेव त्यागी के घर हो रही अपनी बेटी की शादी के वक्त अपमानित की गयी उस नन्हे बालक (स्वयं ओमप्रकाशजी) एवं उसकी छोटी बहन माया की मां ‘उस रात गोया दुर्गा’ बनी थी और उसने त्यागी को ललकारा था और एक ‘शेरनी’ की तरह वहां से अपनी सन्तानों के साथ निकल गयी थी। कल्पना ही की जा सकती है कि जिला मुजफ्फरनगर के एक गांव में – जो 21 वीं सदी की दूसरी दहाई में भी वर्चस्वशाली जातियों की दबंगई और खाप पंचायतों की मनमानी के लिए कुख्यात है – आज से लगभग साठ साल पहले इस बग़ावत क्या निहितार्थ रहे होंगे। उनकी मां कभी त्यागी के दरवाजे नहीं गयी।

इस नन्हे बालक के मन पर अपनी अनपढ़ मां की यह बग़ावत – जो वर्णसमाज के मानवद्रोही निज़ाम के तहत सफाई के पेशे में मुब्तिला थी और उस पेशे की वजह से ही लांछन का जीवन जीने के लिए अभिशप्त थी – गोया अंकित हो गयी, जिसने उसे एक तरह से तमाम बाधाओं को दूर करने का हौसला दिया।

उस नन्हे बालक का वह दर्द हमेशा उनके साथ रहा इसलिए एक कविता में उन्होंने लिखा था

‘तुम्हारी महानता मेरे लिए स्याह अंधेरा है,,

मैं जानता हूं,/मेरा दर्द तुम्हारे लिए चींटी जैसा/ और तुम्हारा अपना दर्द पहाड़ जैसा

इसलिए, मेरे और तुम्हारे बीच/ एक फासला है/जिसे लम्बाई में नहीं/समय से नापा जाएगा। (जूता)


1997 में प्रकाशित अपनी इस आत्मकथा से बहुचर्चित हुए ओमप्रकाश वाल्मिकी – जिन्होंने अपने विविधतासम्पन्न रचनासंसार से एक नयी ज़मीन तोड़ी – उनका पिछले दिनों इन्तक़ाल हुआ। पिछले लगभग एक साल से उनके अस्वस्थ्य होने के समाचार मिल रहे थे। उनकी आंत का सफल आपरेशन भी हुआ था, मगर फिर तबीयत तेजी से बिगड़ी। और देहरादून के मैक्स अस्पताल में उन्होंने अन्तिम सांस ली।

चाहे ‘बस्स! बहुत हो चुका’ जैसा कवितासंग्रह हो या ‘सलाम’ शीर्षक से आया कहानी संग्रह हो या ‘दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र’ जैसी रचना हो या ‘सदियों का सन्ताप’ जैसी अन्य पुस्तक हो, वाल्मीकीजी ने साहित्य के इन तमाम रूपों के जरिए एक विशाल तबके के लिए अपमान-जिल्लत भरी जिन्दगी जीने की मजबूरी के खिलाफ अपनी जंग जारी रखी। ताउम्र डा अम्बेडकर के विचारों की रौशनी में अपनी इस मुहिम में संलग्न रहे जिससे उनका साबिका कालेज जीवन में पड़ा था, जब उन्हें किसी ने अम्बेडकर की किताब लाकर दी थी।

प्रस्तुत लेखक की उनसे पहली मुलाक़ात वर्ष 1999 में हुई थी, जब वह जबलपुर के आर्डिनेन्स डिपो में तबादला होकर नए नए पहुंचे थे। ‘साझा सांस्कृतिक अभियान’ के बैनर तले सांस्कृतिक आन्दोलन के सामने खड़ी चुनौतियों पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हम लोगों ने किया था, जिसमें उन्हें उद्घाटन के लिए बुलाया था। निजी बातचीत में मैंने उन्हें जब यह बताया कि उनकी आत्मकथा ‘जूठन’ आधारित एक नाटक पंजाब के हमारे एक साथी सैम्युअल ने तैयार किया है, जिसका जगह जगह हम लोग मंचन करते हैं, तो उन्हें बहुत खुशी हुई थी। उन्होंने नाटक को देखने की – जो एक मोनोएक्ट प्ले था – इच्छा जाहिर की थी।

उन दिनों मैं 20 वीं सदी के पहले ‘दलित हस्ताक्षर’ के नाम से जाने जाते हीरा डोम – जिनकी रचना ‘अछूत की शिकायत’ महावीरप्रसाद द्विवेदी द्वारा प्रकाशित पत्रिका में 1916 में छपी थी- को लेकर कुछ सामग्री संकलित कर रहा था, जिसको लेकर मैंने उनसे बात की। मेरी रूचि हीरा डोम के अन्य विवरण जानने को लेकर थी, उन्हें जितना मालूम था इससे उन्होंने मुझे अवगत कराया था।

इसके बाद साहित्यिक गोष्ठियों के आयोजन में उनसे कभी कभी मुलाकात होती थी। अभी पिछले साल दिल्ली के अम्बेडकर विश्वविद्यालय ने दलित साहित्य पर एक दो दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया था, जिसमें वह सपत्नीक आए थे। उनका स्वास्थ्य अच्छा लग रहा था। उन्होंने बताया था कि अब वह रिटायर हो चुके हैं और लेखन पर ही केन्द्रित कर रहे हैं। उस वक्त़ इस बात का गुमान कैसे हो सकता था कि मैं उनसे आखरी बार मिल रहा हूं।

अलविदा ! वाल्मीकिजी !!
एल.एस. हरदेनिया


इस समय अनेक लोग यह मत प्रगट कर रहे हैं कि अगला चुनाव (लोकसभा) कांग्रेस और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच होगा। जब ऐसा कहा जाता है तो इसका अर्थ यह होता है कि अगला चुनाव विचारधाराओं के बीच होगा। जब हम कांग्रेस की विचारधारा की बात करते हैं तो उसमें अकेले आज की कांग्रेस की विचारधारा शामिल नहीं है। उसमें वह विचारधारा शामिल है जो आजादी के पहले कांग्रेस की विचारधारा थी जिसमें लोकतंत्र, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता शामिल हैं। इसके ठीक विपरीत यह जानना जरूरी है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा क्या है।
यह एक स्वीकृत तथ्य है कि आज भी संघ की विचारधारा वही है जो उसकी स्थापना के समय थी या जिसे बाद में गुरू गोलवलकर ने विकसित किया। संघ की यह विचारधधरा उन सभी मूल्यों के विपरीत है जो आज के भारत की नींव हैं। आज के भारत का मुख्य आधार संसदीय प्रजातंत्र हैं-एक ऐसी राजसत्ता,जिसका आधार धर्म नहीं है। इसी विचारधारा के अन्तर्गत हमने देश को राज्यों का एक संघ बनाया है,जिसमें हमनें देश के नागरिकों को कुछ मूलभूत अधिकार दिए हैं। हमने सभी प्रकार के अल्पसंख्यकों को पूर्ण सुरक्षा की गारंटी दी है। साथ ही, उन्हें अपना विकास करने का अवसर दिया है। संघ की विचारधारा इन सब बुनियादी मूल्यों के विपरीत है।

सर्वप्रथम संघ का उद्देश्य भारत को एक हिन्दू राष्ट्र बनाना है। संघ की ओर से बार-बार कहा जाता है कि भारतीय राष्ट्रीयता का आधार हिन्दुत्व है। यद्यपि संघ का दावा रहता है कि हिन्दुत्व जीवन पद्धति है धर्म नहीं। जहां एक ओर संघ यह कहता है कि राष्ट्र का आधार हिन्दुत्व होगा वहीं उसके उद्देश्यों में हिन्दुओं का विकास और उन्हें संगठित करना भी शामिल हैं। संघ द्वारा प्रकाशित एक पुस्तिका (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिज्ञासा और समाधान) में हिन्दू को परिभाषित किया गया है। इस पुस्तिका में संघ के स्वयंसेवकों के लिए एक संकल्प भी प्रकाशित किया गया है। संकल्प इस प्रकार है हमारी प्रिय मातृभूमि भारत माता की एकता और अखंडता की रक्षा के लिए और अपने पवित्र हिन्दू धर्म तथा संस्कृति के भ्रद्वास्पद प्रतीक गोमाता, मंदिर व माता बहिनों की रक्षा के लिए कटिबद्ध हूँ। प्रत्येक हिन्दू भाई-बहिन के धार्मिक संरक्षण के लिये मेरा प्रयास रहेगा। भगवान मेरे इस संकल्प को पूर्ण करने की शक्ति और भक्ति मुझे प्रदान करे। भारत माता की जय, हिन्दू धर्म की जय
इस संकल्प से स्पष्ट है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा स्वयंसेवक सिर्फ हिन्दू भाई-बहिनों की रक्षा की गारंटी देता है न कि प्रत्येक भारतीय नागरिक की।
गुरू गोलवलकर की एक महत्वपूर्ण किताब है। उस किताब का नाम है ‘‘^^Bunch of Thoughts**इस किताब में संघ के समग्र दर्शन की व्याख्या की गई है। इस किताब में गुरू जी ने विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर विचार प्रगट किए हैं। जो विचार किताब में संकलित हैं,यदि उन पर अमल किया जाता है तो हमारे देश का वर्तमान स्वरूप छिन्न-भिन्न हो जाएगा।
गुरू जी अपनी किताब में देश में एकात्मक अर्थात यूनीटरी स्वरूप की सिफारिश करते हैं। इसके अनुसार देश में राज्यों की सरकारें समाप्त हों जायेंगी और पूरे देश का शासन देश की राजधानी से संचालित होगा। भारतीय राष्ट्र का जो स्वरूप है उसमें एकात्मक सरकार की कल्पना की नहीं जा सकती। देश में अनेक भाषायें बोली जाती हैं। इस समय हमारे देश में अनेक राज्य भाषायी आधार पर गठित किए गए हैं। इन विभिन्न भाषा-भाषी राज्यों की संवेदनशीलता का सम्मान संघीय व्यवस्था में ही किया जा सकता है। गोलवलकर अपनी किताब में कहते हैं कि वर्तमान संघीय व्यवस्था में बांटने वाली ताकतों को प्रोत्साहन मिलता है। संघीय ढांचे से एक राष्ट्र की कल्पना प्रभावित होती है क्योंकि वह एक विभाजन वाली कल्पना है। इसका अंत आवश्यक है। इसका अंत करने के लिये संविधान में आवश्यक संशोधन किया जाना चाहिए। वर्तमान व्यवस्था को समाप्त कर एकात्मक शासन की स्थापना होनी चाहिए।’’मेरी राय में ज्योंहि संघीय ढांचे को तोड़ा जाएगा उसके साथ ही हमारे देश के टुकड़े हो जाएंगे।
इसी तरह गोलवलकर सारे देश के लिये एक ही भाषा पर जोर देते हैं। क्या भारत के सभी क्षेत्रों पर एक ही भाषा थोपी जा सकती है? जब भी ऐसा प्रयास होगा हमारा देश टूट जाएगा। क्या हम पाकिस्तान से सबक नहीं सीखेंगे, पाकिस्तान के शासकों ने पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बंगलादेश) पर उर्दू थोपने की कोशिश की नतीजे में पाकिस्तान ही टूट गया। पाकिस्तान में जो कुछ हुआ है, उससे यह सिद्ध होता है कि आम आदमी के लिए भाषा का स्थान धर्म से ऊपर है। यदि संघ और उसका राजनीतिक अवतार भाजपा सत्ता में आने पर पूरे देश पर एक ही भाषा लादने की कोशिश करेंगे तो वे देश के अनेक टुकड़े हो जाएगें।
संघ के दर्शन का एक सर्वाधिक दुःखद पहलू है अल्पसंख्यकों के प्रति उसका रवैया। संघ का पूरा रवैया मुस्लिम और ईसाई विरोधी है। इस संबंध में जो कुछ गुरू गोलवलकर ने कहा है वह संघ और भाजपा के लिए अटल और अंतिम सत्य है। गुरू गोलवलकर एक स्थान पर कहते हैं कि वैसे तो भारत हिन्दुओं का एक प्राचीन देश है। इस देश में पारसी और यहूदी मेहमान की तरह रहे हैं परन्तु ईसाई और मुसलमान आक्रामक बन कर रह रहे हैं। मुसलमान और ईसाई भारत में रह सकते हैं परन्तु उन्हें हिन्दू राष्ट्र के प्रति पूरे समर्पण के साथ रहना पड़ेगा लगता है संघ और भाजपा इस  मामले में भी पाकिस्तान से सबक सीखना नहीं चाहते हैं। पाकिस्तान में वहां रहने वाले अल्पसंख्यकों (हिन्दू आदि) को योजनाबद्ध तरीके से भगाया गया है। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के प्रति घृणा का भाव पैदा किया गया है। अल्पसंख्यकों के प्रति इस तरह के रवैये के चलते एक मोड़ ऐसा भी आया जब बहुसंख्यक सुन्नी देश पाकिस्तान में शियाओं के साथ वैसा ही व्यवहार किया जाने लगा है। इस साल के प्रारंभ में मैं पाकिस्तान में था। वहां शिया-सुन्नी विवाद इतना बढ़ गया है कि अब वहां के शिया असुरक्षित तो महसूस करते ही हैं वे अब मांग कर रहे हैं कि उन्हें भी अल्पसंख्यकों का कानूनन दर्जा दिया जाए। संघ को समझना चाहिए कि पाकिस्तान के सुन्नी मुसलमानों के रवैये से वहां की शांति स्थायी रूप से समाप्त हो गई है।
संघ वर्षों से प्रयासरत है कि उसकी कल्पना का भारत बने। उनका प्रयास है कि भारत एक धर्म आधारित देश बने। संघ और भाजपा को लगता है कि नरेन्द्र मोदी शायद उनके इस सपने को पूरा करेंगे।

इस संबंध में “हिन्दू” समाचारपत्र के प्रतिनिधि की नागपुर स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय में हुई चर्चा का उल्लेख करना चाहूंगा। इस पत्रकार ने यह जानना चाहा कि संघ ने किन कारणों से नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के पद का उम्मीदवार घोषित किया है, इस पर संघ प्रवक्ता ने दावा किया कि नरेन्द्र मोदी व्यवस्था को बदल देगें। इस पर संवाददाता ने पूछा यह कैसे होगा, इस पर प्रवक्ता कहते हैं,वर्तमान व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य मुसलमानों को ज्यादा से ज्यादा लाभ पहुंचाना है। परन्तु मोदी के सत्ता में आते ही तुष्टीकरण की इस नीति की इतिश्री हो जाएगी। देखिए गुजरात में एक भी मुस्लिम विधायक नहीं है। ऐसा ही देश में होगा।

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